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पंचवर्षीय योजनाएँ


  • प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951 - 56) : इस योजना के लक्ष्य थे : शरणार्थियों का पुनर्वास, खाद्यानों के मामले में कम-से-कम संभव अवधि में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना। इसके साथ-साथ इस योजना में सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया आरंभ की गयी, जिससे राष्ट्रीय आय के लगातार बढ़ाने का आश्वासन दिया जा सके। इस योजना में कृषि को प्राथमिकता दी गयी। इस योजना का लक्षित विकास दर 2.1 था और प्राप्त 3.61 हुआ। 




  • द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 - 61) : प्रो. पी. सी. महालनोबिस के मॉडल पर आधारित इस योजना का लक्ष्य तीव्र औद्योगीकरण था। इसके लिए भारी तथा मूल उद्योगों पर विशेष बल दिया गया। इन मूल महत्तव के उद्योगों अर्थात लौह एवं इस्पात, अलौह धातुओं, भारी रसायन, भारी इंजीनियरिंग और मशीन-निर्माण उद्योगों को बढ़ावा देने का दृढ़ निश्चय किया गया। इस योजना का लक्षित विकास दर 4.5 था और प्राप्त 4.27 हुआ। 
  • तीसरी पंचवर्षीय योजना ( 1961 - 66) : तीसरी योजना ने अपना लक्ष्य आत्मनिर्भर एवं स्वयं-स्फूर्ति आर्थव्यवस्था की स्थापना करना रखा। इस योजना ने कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की, लेकिन इसके साथ-साथ इसने बुनियादी उद्योगों के विकास पर भी पर्याप्त बल दिया, जो कि तीव्र आर्थिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक था। इस योजना का लक्षित विकास दर 5.6 था और प्राप्त 2.84 हुआ। 
  • तीन वार्षिक योजनाएँ (1966 - 67 से 1968 - 1969) : वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध से पैदा हुई स्थिति, दो साल तक लगातार भीषण सूखा पड़ने, मुद्रा का अवमूल्यन होने, कीमतों में हुई वृद्धि तथा योजना उद्देश्यों के लिए संसाधनों में कमी होने के कारण चौथी योजना को अंतिम रूप देने में देरी हुई। इसलिए इसके स्थान पर चौथी योजना के प्रारूप को ध्यान में रखते हुए 1966 से 1969 तक तीन वार्षिक योजनाएँ बनाई गयी। इस अवधि को 'योजना अवकास' कहा गया है।